काम एक गहन विश्लेषण

प्रत्येक व्यक्ति को काम भावना की मूल प्रवृत्ति की संतुष्टि का अवसर सुलभ कराने तथा काम संबंधों को नियमित और मर्यादित बनाने के लिये स्त्री - पुरूष को विवाह संस्कार के द्वारा दाम्पत्य ( पति - पत्नी ) सूत्र में बांधने की व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त एवम समीचीन हैं । प्राचीनकाल से ही मनुष्य ने काम भावना की संतुष्टि हेतु विवाह का प्रवर्तन और दाम्पत्य मर्यादा का पालन करके स्वयं को पशु - प्रवृत्ति से ऊपर उठाकर संस्कृति के विकास में योगदान दिया है ।

काम शब्द का तात्विक अर्थ है " सृजात्मक " अर्थात स्त्री - पुरुषों का निर्दोष अथवा स्वाभाविक संभोग । इसे आम बोलचाल की भाषा मे ' सहवास की इच्छा ' कहते है । इसी अपरिमेय शक्ति ' काम ' से प्रेरित स्त्री - पुरूष के सृजनार्थ सदाचरण को ' मैथुन ' कहते है , जो सृष्टी का अस्तित्व है । यद्यपि काम कहने से कोई साधारण मनुष्य ' सेक्स ' को छोड़कर और किसी अन्य अर्थ को ग्रहण नही करता ' काम ' शब्द का प्रयोग अनेक अर्थो में किया जाता हैं , यथा - कामना , इच्छा , अभीष्ट पदार्थ , स्नेह , अनुराग , प्रेम , तृष्णा , सहवास की इच्छा आदि । काम नर - नारी ही क्या प्राणीमात्र के लिए एक सहज प्रवृत्ति है । मल - मूत्र , भूख और निद्रा के वेगो कि भाँति ही काम भी प्रत्येक नर - नारी को पीड़ित करता है । इस काम के कारण ही एक वस्तु दूसरी वस्तु पर आकृष्ट होकर संयोग करती हैं । इसीलिए काम को ही सृष्टि अर्थात दो वस्तुओं के मेल से नयी वस्तु की उत्पत्ति का कारण माना गया है ।

काम स्त्री - पुरूष दोनों के लिए समान है , दोनों की एक भूख है , प्यास और तृप्ति भी एक है । जिस प्रकार भूख की तृप्ति प्राणी को इकाई के रूप में जीवित रखने के लिये आवश्यक ही नहीं , अनिवार्य हैं , उसी तरह काम - इच्छा का शांतिपूर्ण समाधान उसे जाति रूप में अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये आवश्यक एवम हितकर हैं । वास्तव में काम स्त्री - पुरूष ही क्या प्राणी मात्र के लिए जन्मतः ईश्वरीय प्रदत्त हैं । इसे वैदिक काल से ही ह्रदय की एक सहज प्रवृत्ति माना जा रहा हैं , जैसा कि अथर्ववेद के निम्न मंत्र से ज्ञात होता हैं - 
कामेन मा काम आगन ह्रदयात्त ह्रदयं परि ।
कुलार्णव तंत्र प्रभृति ग्रंथों में भी यह स्वीकार किया गया हैं कि आहार , निंद्रा और भय के समान ही काम भी एक सहज प्रवृत्ति है । कुलार्णव तंत्र और भविष्य पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि मल - मूत्र , भूख और निंद्रा के वेगो की भांति ही काम भी प्रत्येक स्त्री - पुरूष को पीड़ित करता है । आचार्य भावमिश्र के अनुसार देहधारियों में सर्वथा मैथुन की अभिलाषा उत्पन्न होती है ।

कामशास्त्र के आचार्य वात्सायन ने स्त्री - पुरूष को मनोदशा तथा स्वास्थ्य रक्षा को ध्यान में रखकर ही कहा हैं कि शरीर की स्थिति को बनाये रखने हेतु काम आवश्यक है , जितना कि आहार । पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व इसी प्रवृत्ति के कारण है । जिस दिन भूख और काम खत्म हो जाएंगे , सृष्टि अपने आप परलोक सिधार जाएगी । इसीलिए इसकी अनिवार्यता तथा महत्ता से कोई इंकार नही कर सकता । कारण , सेक्स की अवहेलना समाज की सृजनशक्ति की उपेक्षा हैं , जो सामाजिक संगठन पर घात करती है । सुगठित समाज के अभाव में मानव सभ्यता का अस्तित्व संदिग्ध हि नहीँ , असम्भव है । तभी तो पुरूष स्त्री के लिए उसकी कमनीयता और सौंदर्य के लिए हमेशा तृषित और बैचेन रहता हैं इसीलिए तो यह माना जाता है कि आकर्षण ही काम है । स्त्री - पुरूष के मैथुन - संबंध को ही विशेषता देने से यह उचित ही प्रतीत होता है कि जगत मैथुनात्मक एवम कामात्मक है । सभी दार्शनिको ने काम को आदिदेव माना है ।

शैव लोग सम्पूर्ण संसार के मूल में शिव और शक्ति का संयोग घोषित करते हैं । इतना ही नही , शैव मतानुसार आध्यात्मिक पक्ष में आदि - वासना पुरुष और प्रकृति के संबंध से प्रकाशित है और वही भौतिक पक्ष में स्त्री - पुरुष के संभोग में परिणत होती हैं ।

शुक्लयजुर्वेद में आए हुए एक मंत्र के अनुसार यह कहा जा सकता है कि काम ही एक ऐसा तत्व है जो नर - नारी को परस्पर प्राप्त करने के लिए युग - युग से प्रयत्नशील था और अंतकाल तक रहेगा । प्रसंगाधीन मंत्र में कहा गया है - काम ही दाता हैं और काम ही प्रतिग्रहिता हैं । इसे आप यूं समझे कि नर के मन मे स्थित काम को नारी लेती हैं और नारी के मन मे स्थित काम को नर लेता है , अतः काम ही दाता और प्रतिग्रहता हैं , यह शाश्वत सिद्धांत हैं भारतीय संस्कृति में नर - नारी के स्वाभविक आकर्षण को ही विवाह के मूल में माना गया है । महाभारत में भी कहा गया है कि प्रकृति ने मनुष्यो के मन मे कुछ ऐसा मोह भर रखा है , जिससे पुरूष सदैव स्त्रियों के प्रति आकृष्ट होते हैं और स्त्रियां पुरुषों के प्रति आकृष्ट हुआ करती है । 

" कामसुत्र " के रचयिता आचार्य वात्सायन के अनुसार कान , त्वचा , आंख , जिव्हा , नाक इन पांच इन्द्रियों की इच्छानुसार शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गंध अपने इन विषयों में प्रवृत्ति ही काम है अथवा इन इन्द्रियों की प्रवृत्ति से आत्मा जो आनंद अनुभव करता है , उसे काम कहते हैं । इससे निष्कर्ष यह निकलता हैं कि ज्ञान में जिस विषय का संस्कार उत्पन्न हो जाता है , वह वासना के रूप में ज्ञान में विद्यमान रहता है और जब उस विषय को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न होती हैं तथा आकर्षण पैदा होता हैं , तो उस इच्छा या आकर्षण को काम कहते है । चूंकि यह इच्छा ज्ञान के विषय अर्थात वासना से उठती है , इसलिए उस विषय की वासना को भी काम कहते हैं । आचार्य वात्सायन का मुख्य अभिप्राय यही है ।

काम कहते ही दो अथवा दो से अधिक का बोध होता है , क्योंकि काम किसी विषय का ही होता है , विषय के बिना काम नहीं है । विषय के साथ ही विषयी का बोध होता हैं । विषयी और विषय का संबंध ही काम का कारण है । अतः दो के बिना काम की स्थिति नही है । विषय और विषयी को एकात्म बनाने की प्रवृत्ति आकर्षण है । इसी का दूसरा मुख विकर्षण है । प्रथम प्रवृत्ति है और उसके उपरांत निवृत्ति । अर्थात आकर्षण के उपरांत विकर्षण । विकर्षण तब तक नही हो सकता , जब तक आकर्षण न हुआ हो । मनुष्य के भीतर जिस प्रकार भूख , निद्रा , स्मृति , मेधा , श्रद्धा  आदि अनेक वृत्तियों का निवास है , उसी प्रकार काम वृति का भी निवास है ।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध मनोविश्लेषक डॉ . फ्रायड के अनुसार सेक्स ही जीवन का मूल है और इस प्रकार के स्नेह - बंधनो का मूल भी यही है । आचार्य वात्सायन ने काम को अर्थ , धर्म और मोक्ष की कुंजी बताया है ।

काम संस्कृति का आधार है । जबकि वासना के मूल में वितैषणा ( वित्त ) , दारैषणा ( स्त्री ) और लोकेषणा ( लोक ) निहित है । ये तीनों मानव प्रकृति में विद्यमान है और इनकी पूर्ति से ही सुखानुभूति होती हैं । आयुर्वेद के अनुसार स्त्री में विशेषतः प्रीति ( हर्ष ) , अपत्य ( संतान ) , धर्म , अर्थ और सब लोक प्रतिष्ठित है 

अतः एक - दूसरे के प्रति आकर्षण , प्रेम और उत्सर्ग की सहज भावना , कामेच्छा की संतुष्टि , संतान की कामना , नवजात शिशु एवम प्रसूता स्त्री की रक्षा आदि के कारण कालान्तर में इस संबंध को विवाहित जीवन मे स्थापित किया गया होगा , क्योंकि काम की मर्यादा एवम जीवन को सुखमय एवम आनंदमय बनाने के लिये विवाहित जीवन ही श्रेयस्कर है और यही वजह है कि विवाह प्रथा अनादि काल से प्रचलित है ताकि काम की मर्यादा अषुन्न रहे ।

विवाह पूर्व कामोपभोग ( यौन संबंध ) अमर्यादित  - 

विवाह पूर्व कामोपभोग सुखी विवाहित जीवन का आधार नाह बनाया जा सकता है । भारतीय वाङ्गमय के अनुसार बिना विवाह किए नर - नारियों को कामोपभोग नही करना चाहिए , क्योकि विवाह - सूत्र में बंधे बिना यौन संबंध स्थापित करना सदैव वर्जित और पाप - पूर्ण माना गया है । पुरूष के लिए केवल अपनी पत्नी कामोपभोग के लिए है तथा अन्य सभी स्त्रियां अगम्या हैं । लिंगपुराण में परस्त्री गमन को वर्जित बतलाया है । मनुस्मृति में कहा गया है कि पुरुष को परस्त्री गमन नही करना चाहिए । परस्त्री गमन से सामाजिक जीवन तथा व्यभिचारी पुरुष का व्यक्तिगत जीवन भी दुष्प्रभावित होता है और आगे चलकर नपुंसकता , शीघ्रपतन आदि का सामना करना पड़ता है , जिससे विवाहित जीवन सुखमय के बजाय दुःखमय बन जाता है ।

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